श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक काशी को मंदिरों का शहर कहा जाता है। काशी के ‘कंकर कंकर में शंकर’ का निहितार्थ शायद यही है कि यहां के गली से लेकर घर तक मे आपको शिवालय मिलेंगे और प्रत्येक व्यक्तित्व में शिवत्व। शिव का औघड़पन यहां की मस्ती में सहज प्राप्य है। सम्पूर्ण भारत में विद्यमान 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री काशी विश्वनाथ जी का मंदिर काशी में ही विद्यमान है। ऐसी मान्यता है कि शिव और काशी का संयोग सृष्टि के प्रारंभ से है। गंगा के पावन तट पर स्थित त्रिशूलाधिपति का यह स्थल सम्पूर्ण विश्व मे हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है।

श्री काशी विश्वनाथ

मान्यता के अनुसार 6वीं सदी में गुप्तवंश के शासनकाल मे विश्वेश्वर के प्रचीन शिवायतन की स्थापना हुई जो कालांतर में लुप्त हो गया। एक लंबे कालखंड के बाद 11 वीं सदी में राजा हरिश्चंद्र द्वारा इसका जीर्णोद्धार करवाया गया। परंतु सन 1194 में मोहम्मद गौरी द्वारा इस मंदिर को लूटने के पश्चात पुनः इसे तुड़वा दिया गया था। 14 वीं शताब्दी में इस शिवायतन का पुनर्निर्माण कराया गया।

श्री काशी विश्वनाथ शिव लिंगम्
श्री काशी विश्वनाथ (शिव लिंगम्)

विदेशी आक्रांताओं के भारत पर प्रभुत्व ने धर्म और मंदिरों को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। जौनपुर के शर्की बादशाहों ने 1436-1448 के मध्य 1447 में जौनपुर के सुल्तान मुहम्मद शाह द्वारा विश्वनाथ मंदिर को ध्वंस कर दिया। जिसके ध्वंसावशेष से जौनपुर की बड़ी मस्जिद का निर्माण कराया गया। मुगल शासक अकबर के शासनकाल में हुए राजा टोडरमल के समय में पं0 नारायण भट्ट ने विश्वनाथ मंदिर निर्माण कर शिवलिंग की स्थापना कराया। जो लिखित संदर्भ के रूप मे डॉ. एएस भट्ट की पुस्तक ‘दान हारावली’ में है। लेकिन कट्टर मुगल शासक औरंगजेब ने अपने शासनकाल में हिन्दुओं की आस्था यानी मंदिरों पर सबसे ज्यादा प्रहार किया। औरंगजेब की धार्मिक अहिष्णुता का प्रभाव काशी के मंदिरों पर भी पड़ा। मंदिर ध्वस्त करने के क्रम में औरंगजेब के निर्देश पर 2 सितम्बर 1669 को काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त कर दिया गया। 18 अप्रैल 1669 को औरंगज़ेब द्वारा जारी एक फरमान में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया। उसका यह फरमान आज भी एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में सुरक्षित है।

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ध्वस्तीकरण के पश्चात दिखती श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की दीवारें

महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा निर्माण

कालांतर में बाबा विश्वनाथ की अनुकंपा से इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 1777 में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को वर्तमान स्वरूप दिया था। महारानी के मुख्य पुरोहित जयराम शर्मा के नेतृत्व में जन्माष्टमी के दिन सोमवार 25 अगस्त 1777 को इस मंदिर की स्थापना हुई। नागर शैली में स्थापित विश्वनाथ जी का मंदिर स्थापत्य कला की कसौटी पर भले ही सामान्य हो लेकिन खगोलीय दृष्टि का बोजोड़ उदाहरण है।

मंदिर की स्थापत्य शैली

ब्रिटिश काल मे बनारस के जिलाधिकारी रहे जेम्स प्रिंसेप ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का विस्तृत वर्णन किया है। जिसके अनुसार मंदिर का मुख्य अन्तःक्षेत्र 108 फीट (32.92मीटर) के चौकोर (प्लेटफार्म) पर बना है। जिसका हर किनारा सांस्कृतिक खगोलीय प्रारूप को दर्शाता है। मंदिर का 27 चंद्र नक्षत्रों का द्योतक है एवं 108 ब्रह्माण्डीय समन्वयक संख्या 12 राशियों, मास एवं 9 ग्रहों का गुणनखंड है। श्री विश्वनाथ मंदिर निर्माण में खगोल शास्त्र का वृहद प्रयोग इसके अष्टपद विन्यास से स्पष्ट परिलक्षित होता है। मंदिर के पूर्व से दक्षिण की ओर ज्ञान मण्डप, तारकेश्वर मण्डप, मुक्ति मण्डप, दण्डपाणि मण्डप, श्रृंगार मण्डप, गणेश मण्डप, ऐश्वर्य मण्डप एवं भैरव मण्डप है। इस विन्यास के केन्द्र में 8 गुणे 8 ग्रिड के फलक का 64 समूह है। जिसे बाबा विश्वनाथ का प्रवित्र के रूप में पूजित है।

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Kashi_Vishwanath_Temple_Architecture_1891

पूर्णतया पत्थरों से निर्मित इस मंदिर का शिखर भगवान शिव के त्रिशूल की आकृति सा प्रतीत होता है। मध्य शिखर पर स्वर्ण कलश जबकि पहले पर दण्डपाणिश्वर शिव एवं सबसे उपर भगवान शिव का ध्वज है जो दूर से ही दिखाई देता है। शिखर की उंचाई 51 फीट है। मंदिर के द्वार पर नौबतखाना भी है जिसका निर्माण वारेन हेस्टिंग्स एवं अली इबाहिम खां के निर्देश पर सन् 1880 में किया गया। मंदिर का आकर्षण उस समय और बढ़ गया जब 1839 में लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर सोने की चादर चढ़वाया। जिसका आधार तांबे का है। माना जाता है कि करीब 2.5 मन सोना सोने की परत के रूप में प्रयोग किया गया। नेपाल नरेश ने एक विशाल नंदीजी की स्थापना के साथ ही एक बड़ा घण्टा भी यहां दान में दिया था।

ज्ञानवापी कूप और मस्जिद

एक कहावत है कि काशी में आठ कूप और नौ बावलियां हैं। परन्तु पुराण साहित्य में केवल 6 बावलियों का उल्लेख है। काशी में प्राचीन काल में इन बावलियों की यात्रा होती थी। वर्तमान में सिर्फ 2 ही वापियों की यात्रा होती है। इस क्रम में कर्कोटक वापी है तथा ज्ञानवापी। पुराणों के अनुसार ज्ञानवापी की उत्पत्ति जब ईशान ने अविमुक्तेश्वर के पूजन के निमित्त अपने त्रिशूल से खोदकर पृथ्वी से जल निकाला और इससे उनको स्नान कराया। इस वापी के जलपान का बड़ा महत्व है। इससे ज्ञान की वृद्धि होती है जो मुक्ति में सहायक है। इसलिये इसका नाम ही ज्ञानवापी कहा गया है। यह प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर के दक्षिण तथा वर्तमान विश्वनाथ मंदिर के उत्तर में स्थित है।

देवस्यदक्षिणेभागेवापीतिष्ठति_शोभना।
स्तथोदकंपीत्वापुनर्जन्मविद्यते।।

(लि०पु०,कृ०क०त०,पृ०१०९)

काशी में होने वाली समस्त धार्मिक यात्राओं का संकल्प इसी कूप के पास बने व्यासपीठ से ही लिया जाता है और यही समाप्त होता है।

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ज्ञानवापी कूप – Gyanwapi koop

औरंगजेब द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने के बाद से उसे ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जाना जाता है। मंदिर के तोड़े जाने तथा बचे हुए अवशेषों को आप मस्जिद के पार्श्व भाग में देख सकते हैं। जहां आज भी मां मंगला गौरी का विग्रह है, जिसके पूजन के लिए चैत्र नवरात्र में मात्र एक दिन के लिए श्रद्धालुओं को जाने दिया जाता है।

श्री काशी विश्वनाथ की विशेषता

सम्पूर्ण विश्व में श्री काशी विश्वनाथ एक मात्र मंदिर है जहां स्वयं भगवान शिव माता शक्ति के साथ विराजमान हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ शक्ति की देवी मां भगवती के साथ यहाँ विराजते हैं। काशी में स्थित काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दो भाग हैं। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं तथा दूसरी तरफ स्वयं भगवान शिव वाम रूप (सुंदर रूप) में विराजमान है। इस कारण इसे काशी का अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है। माता भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में खुलता है। यहाँ मनुष्य को संपूर्ण मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान शिव स्वयं यहाँ तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं।

तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार

तंत्र की दृष्टि से बाबा विश्वनाथ के दरबार में चार प्रमुख द्वार हैं- 1. शांति द्वार, 2. कला द्वार, 3. प्रतिष्ठा द्वार, 4. निवृत्ति द्वार, तंत्र में इन चारों द्वार का विशिष्ट स्थान है। बाबा विश्वनाथ के गर्भगृह का शिखर श्री यंत्र से मंडित है। अतः यह तंत्र साधना का भी प्रमुख केंद्र है।बाबा विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह के ईशान कोण में स्थित है। इस कोण का अर्थ होता है संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार।बाबा विश्वनाथ को काशी में गुरु और राजा के रूप में भी माना जाता है। बाबा दिन भर गुरु के रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि के 9:00 बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है उस समय वह राज वेश में होते हैं। अतः उन्हें राजराजेश्वर भी कहा जाता है।

दर्शन के विशेष दिन

वैसे तो प्रत्येक दिन बाबा विश्वनाथ का अभिषेक सुबह एवं शाम को गंगा जल से किया जाता है परंतु सावन के सोमवार के समय यहाँ भक्तों का मेला लगा रहता है। यहाँ बहुत दूर-दूर से भक्त दर्शन व जलाभिषेक करने आते हैं। इसी प्रकार से महाशिवरात्रि पर्व के समय भी बाबा का दरबार भक्तों से भरा रहता है। इसके अलावा प्रत्येक सोमवार को बाबा के दर्शन व पूजन के लिए यहाँ भक्तों की काफी भीड़ होती है।

श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर

महारानी अहिल्याबाई होल्कर के 245 वर्षों के बाद यह पहली बार है जब किसी ने काशी विश्वनाथ मंदिर के ज़ीरोंद्धार का कार्य कराया है। महारानी अहिल्याबाई के समय भी केवल मंदिर के गर्भ गृह व मंदिर के आसपास का निर्माण कार्य हुआ था। परन्तु भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस मंदिर को एक भव्य रूप विश्वनाथ कॉरिडोर के स्वरूप में दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसका संकल्प 2014 में लिया था और खरमास शुरू होने से पहले ही 13 दिसंबर को उनके द्वारा श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण किया जाएगा।

Vishwanath Corridor
Vishwanath Corridor विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर परियोजना (Kashi Vishwanath Temple Corridor Project)

श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर लगभग 55000 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। कॉरिडोर के निर्माण के लिए मंदिर परिसर के आसपास की लगभग 40000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल का अधिग्रहण भी किया गया जिसमें आसपास मन लगभग 260 भवन स्वामियों को वहां से विस्थापित किया गया। इस दौरान उन्हें और वहां रह रहे किरायेदारों तक को उचित मुआवजा दिया गया जिसमें करीब 2 वर्षों तक का समय लग गया। 

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर परियोजना से जुड़े कुछ मुख्य बातें

  • अधिग्रहण करने के पश्चात यह पता चला कि वहां कई पुरातन मंदिर और विग्रह भी स्थित थे जिनकी संख्या करीब 125 के आसपास थी।
  • काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर परियोजना के निर्माण में लगभग 600 करोड़ की राशि खर्च हुई है।
  • काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में कुल भवनों की संख्या 24 है और इसके साथ ही 3 यात्री सुविधा केंद्र का भी निर्माण किया गया है।
  • काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार बनाए गए हैं।
  • मंदिर में परिक्रमा करने के लिए मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा पथ भी बनकर तैयार है इसके अलावा मंदिर परिसर में जितने भी प्राचीन मंदिर थे उन्हें भी कॉरिडोर में संरक्षित किया गया है।
  • यह परियोजना काशी विश्वनाथ मंदिर को पवित्र गंगा के घाटों से जोड़ती है। इसमें लगभग 320 मीटर लंबा और 20 मीटर चौड़ा पक्का पैदल मार्ग शामिल है। 
  • राम मंदिर के बाद अब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण कर सरकार अपनी धार्मिक सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित और संरक्षित करने का कार्य तेजी से कर रही है।
  • पहले जहां मात्र कुछ हजार लोग ही मंदिर परिसर में पूजा कर पाते थे, वही कॉरिडोर बनने के बाद अब एक साथ 5 लाख श्रद्धालु पूजा अर्चना कर पाएंगे।
Vishwanath Corridor
विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर Vishwanath Corridor

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में क्या-क्या बनाया गया?

  1. मंदिर चौक
  2. मुमुक्षु भवन
  3. सिटी म्यूज़ियम
  4. वाराणसी गैलरी
  5. यात्री सुविधा केंद्र
  6. आध्यात्मिक पुस्तक केन्द्र
  7. पर्यटक सुविधा केंद्र
  8. वैदिक भवन
  9. जलपान केन्द्र
  10. अन्न क्षेत्र
  11. दुकानें

पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र

Vishwanath Corridor
विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर Vishwanath Corridor

पर्यटन के दृष्टिकोण से भी काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर परियोजना एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, जिसमें कॉरिडोर बनने से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और लोग आसानी से दर्शन पूजन कर पाएंगे। प्रतिवर्ष बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने देश-विदेश से श्रद्धालु का आगमन होता है। कॉरिडोर बनने के बाद यहाँ दर्शन पूजन के लिए यहां पहले से काफी अधिक भीड़ होगी। 600 करोड़ की लागत से बना यह भव्य कॉरिडोर लोगों में आकर्षण का केंद्र भी बनेगा।

काशी को मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है, काशी में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है,

काशी कबहुँ न छोड़िये, विश्वनाथ का धाम,

मरने पर गंगा मिले, जियते लंगड़ा आम ।।

अतः काशी, वाराणसी अपने बोली भाषा व् कहावतों के लिए भी प्रसिद्ध है।

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2 thoughts on “श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास”

  1. आज की काशी नगरी को देख कर मन प्रशन्न हो गया। परन्तु काशी का इतहास जानकर दुःख भी हुआ।

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