ध्यान (योग) क्या है

ध्यान की परिभाषा अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग अलग हो सकती है। परंतु ध्यान का अर्थ सभी के लिए एक है। कई लोग सोचते हैं की किसी भी एक विषय अथवा वस्तु पर अपने मन एवं विचारों को केंद्रित करना (Focus) करना ही ध्यान है। परंतु यह अवधारणा पूर्णतः गलत है। किसी भी विषय अथवा वस्तु पर अपने मन एवं विचारों को केंद्रित करना ध्यान ध्यान की पहली श्रेणी होती है। कई लोग एकाग्रता (Attention) को भी ध्यान समझ लेते हैं। किंतु ध्यान व एकाग्रता (Attention) में धरती और आकाश का अंतर होता है। एकाग्रता वाहनों में लगे हेड लाइट की तरह होता है। वह केवल एक दिशा अथवा जगह पर ही फोकस करता, परंतु ध्यान उस सूर्य के समान है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है।

एकाग्रता वाहनों में लगे हेड लाइट की तरह होता है। वह केवल एक दिशा अथवा जगह पर ही फोकस करता, परंतु ध्यान उस सूर्य के समान है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है।

अर्थात आंखें बंद करके किसी का स्मरण करना या फिर कोई भी क्रिया करना ध्यान की श्रेणी में नहीं आता है। ध्यान तो पूर्णतः क्रिया व विचार मुक्त होता है। ध्यान करते समय आपके मन में कोई भी विचार नहीं होना चाहिए। ध्यान तो अनावश्यक विचारों से बहुत दूर मन व आत्मा के शुद्ध अंतः करण में चले जाना है। अपने मन में चल रहे विचारों को पूर्णतः खाली कर देना ही ध्यान है।

योग मुद्रा में एक योगी
योग मुद्रा में एक योगी

ध्यान में हमारी इंद्रियां मन के साथ हो जाती हैं और मन हमारी बुद्धि के साथ हो जाता है और हमारी बुद्धि हमारे अंतः करण में बसे आत्मा से मिल जाती है। वहीं से हमें आत्मज्ञान प्राप्त होता है। ध्यान के माध्यम से हम आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। शुरुआती समय में व्यक्ति आंखें बंद करके ध्यान करता है। धीरे धीरे जब उसका अभ्यास दृढ़ होने लगता है अर्थात वह साधक बनने लगता है तत्पश्चात वह अपने आत्मा बुद्धि तथा मन तीनों के साथ जुड़ जाता है। इसके पश्चात वह हर अवस्था में ध्यान की अवस्था में रह सकता है।

ध्यान करने का लाभ

  • सर्वप्रथम ध्यान करने से मन शांत रहता है। निरंतर ध्यान के अभ्यास से कुंडलिनी जागृत हो जाती है, जिससे हमें परम ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।
  • ध्यान करने के अन्य अनंत लाभ हैं- यदि आप एक साधक हैं उस स्थिति में ध्यान करने से आपको आत्म ज्ञान तथा मोक्ष की प्राप्ति होगी।
  • यदि आप एक विद्यार्थी हैं तो ध्यान करने से आप बहुत ही सरलता से बहुत ही कम समय में किसी भी विषय पर महारथ पा सकते हैं। अर्थात आपके सीखने एवं समझने की क्षमता बहुत ही प्रबल हो जाएगी।
  • यदि आप एक सांसारिक व्यक्ति हैं तो आपके जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आएगी। आप अपने सभी परेशानियों का हल आसानी से स्वयं चिंतन एवं मनन के द्वारा पा सकेंगे।
  • ध्यान हर श्रेणी हर वर्ग के व्यक्ति के लिए शांति, ज्ञान एवं ईश्वर की प्राप्ति का सरलतम मार्ग है।

ध्यान करने की विधि

ध्यान करने के लिए सर्वप्रथम साधक को एक स्वच्छ व शांत स्थान का चुनाव करना चाहिए। ध्यान करने के लिए पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में से किसी भी मुद्रा में बैठा जा सकता है। प्रारंभ में आप किसी भी सहज मुद्रा में बैठ सकते हैं। प्रारंभ में मन को एकाग्र करने के लिए प्राणायाम, नाम स्मरण (जप) का सहारा भी लिया जा सकता है। क्योंकि जब तक आपको यह पता नहीं होगा कि ध्यान में आपको जाना कहां है तब तक आप ध्यान नहीं लगा पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि आपको ट्रेन से दिल्ली जाना है तब आप दिल्ली की टिकट लेते हैं। यदि आप किसी भी ट्रेन में ऐसे ही बैठ जाए तब आप भटकते ही रह जाएंगे। इसी प्रकार प्रारंभ में अपने इष्ट देव, कुलदेवता अथवा अपने गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार ही ध्यान करना चाहिए।

अर्धनारीश्वर रूप में भगवान शिव
अर्धनारीश्वर रूप में भगवान शिव

ध्यान करने की प्रक्रिया के प्रारंभ में आपका मन थोड़ा व्याकुल व अस्थिर हो सकता है। लंबे समय तक बैठने पर आपको शारीरिक कष्ट भी महसूस होगा। परंतु ध्यान एक अभ्यास है, यह एक दिन में नहीं होता है। लगातार अभ्यास से आप किसी भी मुद्रा वह किसी भी आसन में लंबे समय तक बैठ सकेंगे। निरंतर अभ्यास से आपका मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगेगा। सदाचार, सद्विचार, यम, नियम का पालन और सात्विक भोजन से भी ध्यान में सरलता प्राप्त होती है।

ध्यान मुद्रा में भगवन शिव
ध्यान मुद्रा में भगवन शिव

निरंतर अभ्यास के पश्चात आप अपने शरीर, अपने आसपास के वातावरण इत्यादि को भूल जाते हैं। ध्यान की निरंतरता से आपकी कुंडलिनी जागृत हो जाती है और साधक को कई प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं। जिनके माध्यम से आप क्रोध लोभ मोह इत्यादि के माया जाल से मुक्त हो जाते हैं। आपको आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, और अंततः आपको मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इति – नमो नमः

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