आई वांट माय मदर लैंड बैक – स्टोरी ऑफ़ कश्मीरी पण्डित्स

19 जनवरी 1990, एक दिन अचानक मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से आवाजें आती हैं की कश्मीरी पंडित काफिर है और कश्मीरी पुरुषों को या तो कश्मीर छोड़ देना चाहिए या फिर उन्हें इस्लाम को मानना होगा नहीं तो उन्हें जान से मार दिया जाएगा। इतना सुनने के बाद कई लोगों ने पहले ऑप्शन को चुना। लेकिन कट्टरपंथी इस्लामवादियों और आतंकवादियों द्वारा यह मामला यहां रुका नहीं। उन्होंने कहा तुम जाना चाहते हो तो जाओ लेकिन अपने घर की महिलाओं को यहीं छोड़ जाओ। यहां बाकायदा उनके घरों को उन्हीं के पड़ोसियों द्वारा (जिनके साथ में सदियों से भाईचारा निभाते चले आ रहे थे) उनके मकानों को चिन्हित किया गया। कई पड़ोसी यह भी बात कर रहे थे की इनके घर में 3 लड़कियां हैं तो इनमें से दो मैं रख लूंगा और एक को तुम रख लेना।

मैं इस समय आपके मन के अंदर के आग को समझ सकता हूँ। लेकिन आप टेंशन क्यों ले रहे हैं आप तो एक सेक्युलर देश में हैं और अपने खुद के घर में बैठे हैं। यहां से आपको कौन निकाल सकता है। अब जिनके घर गए हैं उन्हें हम कश्मीर में दोबारा तो नहीं ना बसा सकते हैं। फिर यह सब सोच कर क्या ही फायदा है?

एक कश्मीरी पंडित, जिसका तीन मंजिला मकान, इनके फलों के बागान तथा इनकी मातृभूमि सब कुछ में छीन लिया गया (1990)
एक कश्मीरी पंडित, जिसका तीन मंजिला मकान, इनके फलों के बागान तथा इनकी मातृभूमि सब कुछ में छीन लिया गया (1990)

बहरहाल हम बात करते हैं इस घटना के पीछे के मूल कारण की? लेकिन यहां केवल एक सवाल नहीं है, बल्कि सवालों की क्रमबद्ध कतारें हैं। लेकिन फिलहाल हमें कुछ मुख्य बातों को समझना होगा।

  • यदि आप कई पीढ़ियों से किसी के साथ बाकायदा भाईचारे के साथ रहते हैं तो क्या वह आपकी जान ले सकता है? चाहे उसे कितना भी बहका दिया जाए, हम और आप तो बिल्कुल नहीं कर सकते हैं।
  • वे लड़कियां जो आपके पड़ोस में है, आपको भाई मानती हैं तो क्या आप उनके बारे में इतना गिरा हुआ सोच सकते हैं? यदि आप एक सनातनी हैं तब आपके ह्रदय में ऐसी विश्वासघाती सोच तो उत्पन्न नहीं नहीं हो सकती है।
  • इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ किसका था? या फिर सवाल यह हो सकता है कि जब कश्मीरी ब्राह्मणों के साथ यह घटना घटित हो रही थी तो उस समय भारत सरकार कहां थी? क्या किसी ने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया होगा?

सवाल बहुत है जवाब लिखते लिखते कई दिन गुज़र जायेंगे। अतः यह विषय मनन का है, चिंतन का है, जो आपको करना है। ऊपर के यह तीन सवाल शुरू से ही हम पर लागू होते हैं। बीते भूतकाल में यह घटना कश्मीर में हुई थी, इस पर चिंतन करें ताकी भविष्य में आपके साथ यह घटना घटित न हो, क्या इसके लिए आप आज तैयार हैं? क्योंकि ऐसी कोई भी घटना रातों-रात नहीं घटित होती है। इसके लिए बाकायदा इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। यह आपके साथ आपके भाई से भी ज्यादा प्रेम दिखाते हैं परंतु आचार्य चाणक्य ने एक श्लोक के माध्यम से बताया है

“ससर्पे गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः॥ ”
सांप वाले घर में रहना मृत्यु का कारण बन सकता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

अर्थ मैंने आपको समझा दिया है परंतु इसकी गहराई को आपको समझना है।

सन (1947-1995) के मध्य लगभग 20% कश्मीरी पंडितों की आबादी ने पहले ही कश्मीर को छोड़ दिया था। जैसा कि मैंने आपसे ऊपर बताया यह घटना रातों-रात नहीं घटी है। इसे क्रमबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया था। पहले भोले भाले सहज स्वभाव के व्यक्तियों को प्रताड़ित किया गया। उसके बाद धीरे-धीरे इनके दिमाग में इतना दहशत भर दिया गया कि वे अपने परिवार को बचाने के लिए अपने सदियों के बसे बसाये गृह को भी त्याग कर चल दिए। परंतु 19 जनवरी सन 1990 की घटनाएं विशेष रूप से शातिराना थीं। कई लेखकों के अनुसार 1990 के दशक के दौरान लगभग 100,000 कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर को छोड़ दिया। यह आंकड़ा कहां तक सही है इसके बारे में कोई भी पूरी तरह से सटीक नहीं हो सकता है। परंतु कश्मीरी पंडितों ने पूरी तरह से कश्मीर छोड़ दिया, यह आंकड़ा सबसे सटीक है।

नीचे तस्वीरों में कुछ कश्मीरी ब्राह्मणों की दिनचर्या तथा क्रियाकलाप है जिनमें अब देख सकते हैं की वे केवल और केवल नित्य कर्म व धार्मिक ग्रंथ लिखने का ही कार्य करते थे। केवल पूजा पाठ करने वालों को भी मानव के भेष में बैठे इस्लामवादी दानवों ने नहीं छोड़ा। आगे का विचार मैं आपके ही ऊपर छोड़ता हूं आप इस विषय में क्या सोचते हैं क्या समझते हैं? यह आप पर निर्भर करता है? अंततः मैं कश्मीरी ब्राह्मणों के लिए केवल इतना ही कह सकता हूं…

सन 1890 की एक तस्वीर जिसमें तीन कश्मीरी पंडित कोई धार्मिक ग्रन्थ लिख रहे हैं
सन 1890 की एक तस्वीर जिसमें तीन कश्मीरी पंडित कोई धार्मिक ग्रन्थ लिख रहे हैं

‘ आई वांट माय मदरलैंड बैक ’

आगे सूरज कल भी हुआ था आज भी उगा है और कल भी उगेगा, परंतु जो कल सोया था यदि आज वह नहीं जागा तो आने वाले कल में वह हमेशा के लिए सो जाएगा। यहां मेरी कलम में स्याही खत्म नहीं होती है इसलिए मैं लिखता था लिखता हूं और लिखता रहूंगा।

नमो नमः

Leave a Reply